Sunday, 21 May 2017

महाराणा प्रताप गाथा

दोहराता हूँ राणा के भाला की लिखी कहानी |

इस भारत की रक्षा खातिर फिर से चढी जवानी ||

राजधर्म तो अपने में था खुद की लाज बचाना |

उस पर मुग़लकाल को फन पर चढ़कर जाना ||

सुने युद्ध की बातें सिंहासन डोल गया होगा |

राणा के अन्दर का हलहल करता खून खौल गया होगा ||

रण के अन्तस से उर में भवानी जाग गई होगी |

राणा के हर सैनिक में सेनानी जाग गई होगी ||

हर हर महादेव का नारा देना है कुर्बानी |

दोहराता हूँ राणा के भाला की लिखी कहानी ||(१)

एक हाथ से धड़ को काटे एक हाथ से शीश |

मानों माता माँग रही हो मेवाड़ी आशीष ||

सब हकल -बिकल है उधर पडे देखो तो हाहाकार  उठा |

वीर सपूतों की धरती में एकसाथ हुंकार उठा ||

जयजय उद्घोष हुई धरती भगवा का झंडा फहर गया |

रामराज्य की विजय हुई रावण खुद से फिर हहर गया ||

सौ बार नमन है तुमको तो राणा की सफल जवानी |

दोहराता हूँ राणा के भाला की लिखी कहानी || (२)

डड्गडंग सी करती धरती भूचाल यहाँ पर आया था |

एक वीर ऐसा भी था जो सम्मान बचाने आया था ||

बडे गर्व की बातें हैं स्वाभिमान से जीना है |

घासों की रोटी अच्छी है गंगा का पानी पीना है ||

हे! मुग़लकाल के वंशज सुन तेरे भी दुर्दिन आयेंगे |

तेरे अपने खुद शौक तेरे धरती से तुझे मिटायेंगे ||

तेरे अन्तकाल में तो हर तरफ रहे वीरानी |

दोहराता हूँ राणा के भारत की लिखी कहानी ||(३)

  -Vikas Vishwa

ग्रामीण -होली परिदृश्य

मुर्गा बोले महतो उठि गें साथेन जागें कोलई
गाँव भरे के लरिके जुटि के पहिले फूँके होलई
फिर गायेन दू चार ठू फूहर पातर फगुआ
दउआ तव हुडदंग मचावै सव कै बनि के अगुआ
देखत देखत गाँव भरे माँ रब्दा होई गा चालू
सब मेहररुअये जुटी घरे कै आजी चुरवै आलू
पंचम कै छोटकई पतोहिया कहै सखी सहेली
दऊ दिहिस न देवर हमका केहसे खेली होली
आजी बोली एहमा कौनो हरज नाहीना
एहमा बाबा देवर लागैं फागुन मस्त महीना
बडे मजे मा जात रहेन्हे भेडी मोछा ऐंठे
खूब बनाइस हाथी यस टीकिस उनका बैठे बैठे
साड़ी तव सतरंगी होइ गै और बिलाउज आधा
ऐसन मजा कबो न पायीं सोलह बरस माँ राधा
चढ़े अमेठी मां गाड़ी पय रहें झिगूरी झांकत
कौनो मारिस आँख फूटि गय अन्तू डाकत डाकत

हास- परिहास

हँसिया लै चमकावत बाटीं

अँचरा लाल देखावत बाटीं

राजनीति कै झोंटा खोले

खबर-खबर खजुआवत बाटीं |
  
  विकास विश्व

Saturday, 20 May 2017

कविता परिभाषा

कभी मेंहदी महावर है कभी अंगार है कविता

कभी माँ प्रेम की गंगा की अनगढ धार है कविता

कभी जो स्वाभिमानी देश का अभिमान गाती है

महाराणा के भाला की प्रयोजित भाल है कविता |

           Vikas Vishwa

Saturday, 13 May 2017

माँ

माँ तेरी ममताओं का विधि -विधान सदी जीवित है
वो गुदरी लगुरी का परिधान सदा जीवित है ||

कितनी ऊंची मंजिल कितने बडे उपक्रम हों माँ सब तो फीके लगते हैं
तेरे हाथों के सिवा बने सब व्यंजन फीके लगते हैं ||

तेरे आँचल के भीतर माँ सभी दुआयें मिल जाती हैं
माथे के काले टीके से  माँ सभी बलायें टल जाती हैं ||

माँ मै घर आऊँ तो गोदी में लिये सुला देना
थोडी सी थपकी देना थोडी सी लोरी मुझे सुना देना ||

माँ तेरे ब्रत उपवासों से ब्रम्हाण्ड सदा जीवित है |
तेरे ही ममता-बल से विज्ञान सदा जीवित है ||

माँ तेरी ममताओं का विधि- विधान सदा जीवित है
वो बचपन लगुरी गुदरी का परिधान सदा जीवित है ||
      युवा ओज कवि कुमार

Thursday, 11 May 2017

सलाम सेना

हमारा हर एक सैनिक सवा लाख है
पूरे भारत की वो जो सधी आंख है
करते हरदम सदा दुश्मनों पर फतह
हममें वो भी हुनर हममें वो धाक है
         युवा ओज कवि कुमार विकास