Wednesday, 14 June 2017

मुक्तक

अजब दस्तूर है मौला जो माँगू मिल नही पाता |

कोई एक दर्द मिटता है तो दूजा मिल ही जाता है||

खुशी की चाह मत करना ये मेरे इस जहां वालों

जो जितना सुख को पाता है वो उतना टूट जाता है || (१)

हर पल टूट जाता हूँ मैं हर पल मुस्कुराता हूँ |

तुमसे रूठ जाने की सजा मै खूब पाता हूँ ||

कि तुम कहती थी सारे तोड़ देंगे रश्म औ बन्धन

कहो कुछ भी मगर तुमको निभाना कुछ नहीं आता ||

       -Vikas Vishwa

Sunday, 28 May 2017

जय हो

जय हो भारत माता ,तेरा ही अर्चन हो |

ये धरा महक जाये ,मेरा देश सुगन्धा हो ||

मेरे मन लहरों की ,बस एक तमन्ना है

जब मौत मेरी आये, मेरा ध्वजा तिरंगा हो |

जय हो भारत माता ,तेरा ही अर्चन हो ||(१)

गीता के वचन गूँजे ,श्रीराम का वन्दन हो |

वाहे गुरु की कृपा ,गौतम का दर्शन हो ||

चहुँ ओर धरा गूँजे ,जय विजय महारथ की

और धरा पे फिर, मेरी पावन गंगा हो |

जय हो भारत माता ,तेरा ही अर्चन हो ||(२)

       -Vikas Vishwa

Monday, 22 May 2017

ग्रामीण आँधी -पानी दृश्य

आलू भौंकी मां धरी रही बनवै के बरे रसोइयां मां |
आँधी कै साहस काव कही सब छीट दिहिस अँगनैया मां ||
पाँड़े कै पंडिया खुली रही मिली नहीं खुब भटकी ही |
एक धोती उडी रंगिलिया कै तव जाय पेड. मां लटकी ही ||
साया न मिला सुशीला कै छान्हिन्ह पर से यस लोप भवा |
कुछ रुपिया उड़ि गै सुद्धू कै यस गजब दयू कै कोप भवा ||
जैसे आँधी कुछ कमजोरान पानी कै लहरा आइ गवा |
कुछ फूहर गरियावै लागीं दैवा एकदम बौराय गवा ||

     — साभार असविंद दुबे जी (सबरस कवि)
न जाने काव करैंया बा चैते से अबकी मरत अहै |
तिसरे चौथे आँधी आवै कुसुमै माँ पानी भरत अहै ||
फिर कुलिन वरौनी चुवै लाग सब भीजि गवा भूँसा सारा |
सब हारि गयें सब ऊबि गयें सब का बजि गें पौने बारा ||
भल भागि रहीं बड़का भौजी भौंका भर आम लेहे घर का |
गट्टवा हंसी सै बड़े जोर जब गिरीं गडापै गोड. सरका ||
प्रधान कै रुकी बरात रहै जव पानी बरसा दुपहरिया मां |
छिछवा लेदर मचिगा सब जाय लुकानें सरिया मां ||
शुकुल बेचारे काव करैं उनकै मन एतना खीझि गवा |
गुस्सा मां वै कुछू न टारें बिस्तरौ तलक सब भीजि गवा ||
    

Sunday, 21 May 2017

मेरा -परिचय

नाम- विकास विश्व

पिता का नाम-श्री दूधनाथ मिश्रा
माता का नाम- श्रीमती शुभ लक्ष्मी मिश्रा
ग्राम-पितम्बरपुर
पोस्ट-शाहगढ़
पिन नं-227411
तहसील- गौरीगंज
थाना -मुन्शीगंज
जनपद-अमेठी
प्रदेश -उत्तर प्रदेश
   भारत
मो० नं०- 8795458078

महाराणा प्रताप गाथा

दोहराता हूँ राणा के भाला की लिखी कहानी |

इस भारत की रक्षा खातिर फिर से चढी जवानी ||

राजधर्म तो अपने में था खुद की लाज बचाना |

उस पर मुग़लकाल को फन पर चढ़कर जाना ||

सुने युद्ध की बातें सिंहासन डोल गया होगा |

राणा के अन्दर का हलहल करता खून खौल गया होगा ||

रण के अन्तस से उर में भवानी जाग गई होगी |

राणा के हर सैनिक में सेनानी जाग गई होगी ||

हर हर महादेव का नारा देना है कुर्बानी |

दोहराता हूँ राणा के भाला की लिखी कहानी ||(१)

एक हाथ से धड़ को काटे एक हाथ से शीश |

मानों माता माँग रही हो मेवाड़ी आशीष ||

सब हकल -बिकल है उधर पडे देखो तो हाहाकार  उठा |

वीर सपूतों की धरती में एकसाथ हुंकार उठा ||

जयजय उद्घोष हुई धरती भगवा का झंडा फहर गया |

रामराज्य की विजय हुई रावण खुद से फिर हहर गया ||

सौ बार नमन है तुमको तो राणा की सफल जवानी |

दोहराता हूँ राणा के भाला की लिखी कहानी || (२)

डड्गडंग सी करती धरती भूचाल यहाँ पर आया था |

एक वीर ऐसा भी था जो सम्मान बचाने आया था ||

बडे गर्व की बातें हैं स्वाभिमान से जीना है |

घासों की रोटी अच्छी है गंगा का पानी पीना है ||

हे! मुग़लकाल के वंशज सुन तेरे भी दुर्दिन आयेंगे |

तेरे अपने खुद शौक तेरे धरती से तुझे मिटायेंगे ||

तेरे अन्तकाल में तो हर तरफ रहे वीरानी |

दोहराता हूँ राणा के भारत की लिखी कहानी ||(३)

  -Vikas Vishwa

ग्रामीण -होली परिदृश्य

मुर्गा बोले महतो उठि गें साथेन जागें कोलई
गाँव भरे के लरिके जुटि के पहिले फूँके होलई
फिर गायेन दू चार ठू फूहर पातर फगुआ
दउआ तव हुडदंग मचावै सव कै बनि के अगुआ
देखत देखत गाँव भरे माँ रब्दा होई गा चालू
सब मेहररुअये जुटी घरे कै आजी चुरवै आलू
पंचम कै छोटकई पतोहिया कहै सखी सहेली
दऊ दिहिस न देवर हमका केहसे खेली होली
आजी बोली एहमा कौनो हरज नाहीना
एहमा बाबा देवर लागैं फागुन मस्त महीना
बडे मजे मा जात रहेन्हे भेडी मोछा ऐंठे
खूब बनाइस हाथी यस टीकिस उनका बैठे बैठे
साड़ी तव सतरंगी होइ गै और बिलाउज आधा
ऐसन मजा कबो न पायीं सोलह बरस माँ राधा
चढ़े अमेठी मां गाड़ी पय रहें झिगूरी झांकत
कौनो मारिस आँख फूटि गय अन्तू डाकत डाकत

हास- परिहास

हँसिया लै चमकावत बाटीं

अँचरा लाल देखावत बाटीं

राजनीति कै झोंटा खोले

खबर-खबर खजुआवत बाटीं |
  
  विकास विश्व