आलू भौंकी मां धरी रही बनवै के बरे रसोइयां मां |
आँधी कै साहस काव कही सब छीट दिहिस अँगनैया मां ||
पाँड़े कै पंडिया खुली रही मिली नहीं खुब भटकी ही |
एक धोती उडी रंगिलिया कै तव जाय पेड. मां लटकी ही ||
साया न मिला सुशीला कै छान्हिन्ह पर से यस लोप भवा |
कुछ रुपिया उड़ि गै सुद्धू कै यस गजब दयू कै कोप भवा ||
जैसे आँधी कुछ कमजोरान पानी कै लहरा आइ गवा |
कुछ फूहर गरियावै लागीं दैवा एकदम बौराय गवा ||
— साभार असविंद दुबे जी (सबरस कवि)
न जाने काव करैंया बा चैते से अबकी मरत अहै |
तिसरे चौथे आँधी आवै कुसुमै माँ पानी भरत अहै ||
फिर कुलिन वरौनी चुवै लाग सब भीजि गवा भूँसा सारा |
सब हारि गयें सब ऊबि गयें सब का बजि गें पौने बारा ||
भल भागि रहीं बड़का भौजी भौंका भर आम लेहे घर का |
गट्टवा हंसी सै बड़े जोर जब गिरीं गडापै गोड. सरका ||
प्रधान कै रुकी बरात रहै जव पानी बरसा दुपहरिया मां |
छिछवा लेदर मचिगा सब जाय लुकानें सरिया मां ||
शुकुल बेचारे काव करैं उनकै मन एतना खीझि गवा |
गुस्सा मां वै कुछू न टारें बिस्तरौ तलक सब भीजि गवा ||
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